आस 

आस
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वे दूर रहकर भी पास नहीं
वे पास रहकर भी दूर रही
मेरा मन बस यही कहे:
” क्या करूँ?
अब जीवन जीने की बची आस नहीं।”
रोज़ ढूँढती अपनी खोई छवि
पर मिलता कुछ ख़ास नहीं
घर के अंदर छिपकर,
आँसू बहाती आँखें कहें :
” क्या करूँ?
अब जीवन जीने की कोई आस नहीं।”
सूरज की रोशनी
पेड़ों की हरियाली
मेरे मन को नहीं हर्षाती,
अपने दोस्तों की गपशप
माता-पिता का प्यार
मुझे सुख नहीं पहुँचाती।
कुछ नहीं है जीवन में ख़ुशहाल
इसे अच्छा तो मर जाना है
पर मृत्यु का नाम सुनते ही
मुझ अबोध का डर जाना है।
जानती हूँ बेचैनी मैं
ना चैन से जीना है
ना चैन से मारना है
आज भी समाज से डर-डरकर
अपने में ही कैद रखना है
एक लड़की को मन अपना।
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मुग्धा जैन, X-G

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