शत्-शत् प्रणाम

उम्मीद की कंक्रीट से
कर्म के धरातल पर
सहयोग की तारकोल से 
मजबूत बना डाला जिसने
स्वतंत्रता की सड़क
आत्मविश्वास की शक्ति से
बेधड़क।
उस महामानव को
उस कर्मयोगी को
उस अनुरागी तपस्वी को
उस वीर मनस्वी को
उस अक्षुण विश्वासी को
उस सांसारिक संन्यासी को
जो हिन्दू था
और मुसलमान भी
जिसका आवास
केवल साबरमती के तट पर ही नहीं
था पूरा हिन्दुस्तान भी
जो जपता था ईश्वर अल्लाह
जिसके विषय में सोच कर
आज भी सभी कहते
वल्लाह!
उस अंतहीन नश्वर नर को
उस अर्वाचीन अंबर को
जो अंत समय कह गया
दो शब्द –
हे राम,
ऐसे महात्मा गांधी को
शत्-शत् प्रणाम।।
…………….
– केशव मोहन पाण्डेय

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