शान-ए -टीचर्स

शान-ए -टीचर्स

नन्हे -नन्हे क़दमों से स्कूल की ओर जाते

कंधे पर बस्ता, गले में बोतल और चेहरे पर घबराहट का भाव ले जाते

आँखों में मोटे -मोटे आंसू लिए

स्कूल जाने से हिचकिचाते

तब वे टीचर ही थे जो बहला -फुसलाकर हमें चुप करवाते

और स्कूल में भी घर जैसा एहसास कराते

सही गलत का अंतर बताते और सदैव दूसरों का आदर करना सिखाते

वे टीचर ही हैं जो हमें एक अच्छा इंसान बनाते

बड़ी क्लास में आते ही हमारे सिर सातवे आसमान पर चढ़ जाते

तब यही टीचर हमें संभाल , असली हकीकत से सामना कराते।

बड़े होते -होते हम तो इन टीचर्स को भूल जाते

पर ये टीचर्स अपने उन नन्हे -नन्हे बच्चों को कभी नहीं भुला पाते

हम तो स्कूल पार कर अपनी – अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो जाते

पर ये टीचर्स

कल हमें इंसान बनाया और आज दूसरों को सफल इंसान बनाते

दुनिया का भी अजीब दस्तूर है

पहले दिन स्कूल न जाना पड़े , इसलिए रोते थे

और अब जब स्कूल छोड़कर जाने का समय आता है

तब स्कूल से न जाने के लिए रोते हैं

कुछ टीचर्स से तो इस कदर लगाव हो जाता है

कि उनको छोड़कर जाने का ख़याल , हमें पल -पल सताता है

टीचर्स अपनी सारी ज़िन्दगी हमें एक बेहतर इंसान बनाने में लगा देते हैं

बदले में हमसे केवल थोड़ा सम्मान और स्नेह चाहते हैं

और हम नासमझ ; इतना भी नहीं कर पाते हैं

टीचर्स का हमेशा सम्मान करो , कभी न उनका अपमान करो

स्कूल टीचर्स की तो बात ही निराली है

और हो भी क्यों ना

आखिरकार

इन्होंने देश की बागडोर संभाली है

और हमें बेहतर से और बेहतर इंसान बनाने की ठानी है।

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तान्या सिंह
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