है पूजनीय

 मैंने धरा धाम को देखा
आपके कारण
अनुभव किया
भावनाओं को
अकारण ही मुस्कुराना
देख कर दूसरे की ख़ुशी
आसुओं को रोक न पाना
अपनी आखों से
देख कर पीड़ा
दूसरों की
सीखा मैंने
रोटी के टुकड़े करना
निवाला मुँह में डालने से पहले।
आपसे ही सीखा है
रिश्तों को बटोरना
ज़िंदा रखना
बाँध कर सजाना
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
गुनगुनाना
मुस्कुराना
और चल पड़ना
ताल ठोंक कर
ज़िन्दगी की राहों पर।
आपसे ही मिला जग में
मुझे मेरा नाम है
पितृ दिवस पर
हे पूजनीय पिता
आपको शत्-शत् प्रणाम है।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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