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Posted in Poems, नव-सृजन

आस 

आस —— वे दूर रहकर भी पास नहीं वे पास रहकर भी दूर रही मेरा मन बस यही कहे: ” क्या करूँ? अब जीवन जीने की बची आस नहीं।” रोज़ ढूँढती अपनी खोई छवि पर...

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